ख़त....
तुम्हारे ख़त में नया एक सलाम किसका था,
ना था रक़ीब तो आख़िर वो नाम किसका था।
रहा न दिल में वो बेदर्द और दर्द रहा,
मक़ीम कौन हुआ है, मक़ाम किसका था।
वफ़ा करेंगे, निबाहेंगे, बात मानेंगे,
तुम्हें भी याद है कुछ, ये कलाम किसका था।
गुज़र गया वो ज़माना, कहें तो किससे कहें,
ख़्याल दिल को मेरे सुबह-शाम किसका था।
ना था रक़ीब तो आख़िर वो नाम किसका था।
रहा न दिल में वो बेदर्द और दर्द रहा,
मक़ीम कौन हुआ है, मक़ाम किसका था।
वफ़ा करेंगे, निबाहेंगे, बात मानेंगे,
तुम्हें भी याद है कुछ, ये कलाम किसका था।
गुज़र गया वो ज़माना, कहें तो किससे कहें,
ख़्याल दिल को मेरे सुबह-शाम किसका था।
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