मुंसिफ़

लफ़्ज़ों के साथ इंसाफ़ करने की अदद कोशिश...

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It is too bad to be too good

Tuesday, 21 May 2013

सुहागन


                                                                    सुहागन
सुहागन

आँखों मैं सपने चाँद तारो के लिए एक लाडली घर मैं आयी ,सबने प्यार दिया आँखों का वो तारा वो बनकर बड़ी होने लागी सपने बहुत थे आँखों मैं वोह चंचल बहुत थी ,खुशियों से रिश्ता था उसका वो चहकती रहती थी .समयॆ बीतने लगा और हमारी सुहाना बड़ी होते गयी और बहुत सारे रंगों से उसका नाता बढता गया ,उसे रंग बहुत बहते थे वो हमेशा गहरे रंग ही पहनना पसंद करती थी जो उसमें जोश फुर्ती को और भी बड़ा देते थे और वो आज़ाद परिंदे के तरहा झूमती फिरती थी जहाँ से गुजरती अपने खुसबू और प्यारसे सबको अपना बना लेती थी जो उसे बात करता उसका हे हो जाता था , उसे खुशियाँ बांटना बहुत पसंद था ,हर कोई यही कहता था जिस आँगन जायेगी वो खुशियों से भर जाएगा.
समयॆ यही सिखाता है जितना है उसे खुल कर जी लो कल सायद हो या खुशियाँ मनाने का मौक़ा हे नहीं मिल पाई इसलिए हर पल को आख़िरी समझ कर जी लो आज है वो पास है कल की सिर्फ एक आस है
 अब हमारी खनक बड़ी हो गयी थी घर वालो से ज्यादा  बहार बालों को उसके विवहा के चिंता सताने लगी थी रोज़ कोई न कोई अपने साथ एक नया रिश्ता लेकर ज़रूर आ जाता था  , पिता ने अपनी बिटिया को देखा और सोचा क्या मेरी खनक इतने बड़ी हो गयी कल की  ही तो बात लगती है जब मेरे हाथों मैं पहली बार  लिया था कुछ पल मैं निहारता ही  रह गया था क्या यह मेरा अपना बच्चा है बहुत सुकून वाली अनुभूति थी जैसे सारे जहाँ के खुशियाँ मेरे घर आ गयी हो और मैं खुद को कितना खुश समझ रहा था आज मेरे खनक इतने बड़ी हो गयी के उसके लिए रिश्ते के बात आने लगी वो अपने आप मैं हे कहीं खो गयी थे और लगातार उसे निहारे जा रहे थे जब खनक  उन्हे देखने लगती तो वो अपनी नज़रें घुमा लेते थे
खनक  को भी आज अपने पापा की नज़रें पहले वाली नहीं कुछ बदली सी और चिंता मैं डूबी हुई लग रही थी ,जैसे वो कहना चाहं रही हो मेरे कलेजे के टुकडे मैं कैसे तुझे खुदसे अलग कर पाउंगा मैं कैसे अपनी परी को खुद से दूर अजनबियों केसाथ भेज दूंगा , मेरा बच्चा जो हमेशा मेरे नज़रों केसामने रहा है मुझसे दूर कैसे जाने दूंगा मैं कैसे उसे दूर रह पाउँगा यही सब कशमकश मैं उसके पापा के पलकें भीग ने लगी और गला रुंधा सा गया
  आखिर क्यों बेटियों का नसीब ऐसा होता है जिस आँगन मैं बड़ी हुए जिसे उन्होने पहचान लिया उन्हे वो क्यों छोडना पड़ता है उन्हें  अपनी  ज़िन्दगी नए सिरे से फिर शुरू करना पड़ती है

यह बेदना हर माँ पापा के है बेटियां बड़ी होने लगती है उन्हे यह सताने लगती है .

कुछ एक रिश्तों मैं से आदित्य का रिश्ता खनक के पापा को समझ मैं आया उन्होने जो सोचा था शायद कुछ वैसा ही  था सब लोग बहुत सुलझे और बोलने चलने मैं अच्छे लगे , सबसे जयदा आदित्य का समझदार और सुलझा हुआ होना और औरतों के लिए उसका आदर का नजरिया  कहते है न एक नज़र मैं पसंद आ जाना कुछ वैसा ही आज खनक के पापा खुश से नज़र आ रहे थे



खनक को बुलवाया गया फिर उसे आदित्य के मम्मी पापा और उसके परिवार से मिलवाया गया खनक को कुछ नही बताया गया था उसे जब अचानक से बताया गया तो वो कुछ नाराज़ सी थी और बडे उदास मनन से उसने जो सबसे ख़राब सूट पसंद था निकलकर पहना था पर अचानक से यह कहा गया नहीं तुम्हे सड़ी पहनना है उसने माँ से एक साड़ी पहन ली और चुपचाप से जा कर एक कोने मैं बैठ गयी सबके सवाल शुरू  हो गयी , कहाँ तक स्टडी के है क्या पसंद है , बोलना पसंद है या नहीं हंसती हो या नहीं क्या करना चाहती हो अपने पति मैं क्या खूबियाँ चाहती हो यह सवाल लडके के मम्मी पापा कर रही थे , कुछ सवालों का जवाब खनक दे  रही थी और कुछ सवालों पर वो चुप हो जा  रही थी उसे इतने शर्म आ रही थी समझ नहीं आ रहा था क्या जवाब दूं क्या देने चाहियें इन्हे सब मैं आदित्य के आने के आहट  हुए वो बाहर से अन्दर आया खनक ने उसे नहीं देखा बस आँख झुका कर बैठे रही .

आदित्य ने कुछ सवाल किये और गुमसुम से खनक को देखने लगा उसे महसूस हो गया खनक  कुछ गुस्से मैं है और जयदा बात करना पसंद नहीं कर रही है उसने एक दो सवाल करके सवाल करना बंद कर दिया , तब तक लंच लग चुका था सबने खाना खाया और एध उधर की बातें की खनक ने अपना खाना लगाया और खा कर घर केंदर वाले कमरे मैं चली गयी , सब बातें करते गए फिर आदित्य से पुछा गया क्या खनक पसंद है आदित्य ने हाँ मैं जवाब देकर कहा ज़रा खनक से भी पूछ लीजिये कहीं ऐसा न हो मैं हाँ कहूँ और वो न कह दी और जोर जोरसे हंसने लगा
खनक से जब पुछा गया तो उसे समझ नहीं आ रहा था वो क्या जवाब दें
उसने कहाँ मुझे समझ नहीं आ रहा और एक डर सा लग रहा है, यह डर एक लडकी को हमेशा लगता है वो कैसे सबके साथ  एडजस्ट करेगी सब उसे अपना पायेंगे या नहीं इन्ही सब मैं उसने कह दिया जो आपको सही लगे आप लोग जवाब दीजिये मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा है
सब कुछ विधि के विधान के अनुसार हे हो रहा था और खनक को समझ नहीं आ रहा था वो क्या जवाब दे उसने सब कुछ अपने मम्मी पापा के हाथ मे   छोड़ दिया और सोचने लगी पता नहीं क्या होगा आदित्य पता नहीं कैसा है उसका नेचर और वो कुछ गुमसुम सी बैठ गयी सब आज  खुश थे एक नए परिवार से सम्बन्ध जोड़कर .

खनक फिर से रोज़ के तरह से सुबह सोकर उठी और फिर अपने कामों मैं व्यस्त हो गयी दिन इस तरहा से निकल गयी और शाम को जब सब इक्कठा हुए तो फिर वही सारी बातें करने लगे, जैसा के हर घर मैं होता है जहाँ रिश्ता पक्का हो जाता है , क्या होगा कैसे होगा
खनक से कहा गया वो अपनी सगाई के लिए अपनी एक ड्रेस तैयार कर ले उसने हाँ मैं सर हिला दिया और चुपचाप खाना खाने लगी
और सोचने लगी क्या ड्रेस ले साड़ी या कुछ और फिर उसने सोचा जाकर देख लूंगी जो अच्छा लगेगा बनवा लूंगी
अब घर का महॊल बदल गया था घर मैं सिर्फ  खनक के ही बात होती थी जैसे अचानक से कितनी ख़ास सी हो गयी थी वो फिर मम्मी ने कहा खनक तो आदित्य जी से बात कर लेना उन्हे कुछ पूछना था तुझसे और मोबाइल no वही पर लिख कर रख दिया एस उम्मीद से की खनक खुद से ही बात कर लेगी पर को कशमकश   में बात हे नहीं कर पाई एक झिझक सी थी आखिर क्या बात करेगी वो
 फिर माँ कमरे में आई और उसने देखा मोबाइल no वही दावा हुआ रखा है मम्मी ने फिर उसे बात करने को कहा और  खुद से मोबाइल मिला कर दिया कहंक ने झिझकते हुए हेलो कहा और बात करने लगी आदित्य जान चुका  था खनक शरमा रही है इसलिए उसने अपने आप ही बात करना शुरू कर दिया और धीरे धीरे वो कह्नक से बात करता गया टाइम जैसे बहुत बड़ा हो गया था कट हे नहीं रहा था खनक  को समझ ही नहीं आ रहा था क्या करे फिर कुछ देर में उसने यह कहकर मोबाइल रख दिया पापा आ गए .
आदित्य अब खनक को रोज़ फ़ोन करने लगा धीरे धीरे खनक को उसके साथ बात करना पसंद आने लगा और वो भी आदित्य से बात करने लगी,अब सगाई का दिन पास आ गया था और कहंक ने गुलाबी रंग के साड़ी तैयार करवा ली थी और उसी से मिलती हुई कांच के रंगबिरंगी  चुडिया और माथे पर सजाने को गुलाबी से बिंदी और उसने एक बार सब कुछ पहन कर आइने में खुद को देखा  कैसी लग रही हूँ आज वो सबसे अलग और प्यारी से लग रही थी खुद को आइने मैं पहली बार उसने खुद को देखा था और आज वो खुद को आदित्य की नज़र से देख रही थी मैं उसे कैसी लगूंगी उसे शायद आज खुद से प्यार हनी लगा था अकसर हर लडकी के साथ यही होता है जब उसकी ज़िन्दगी में कोई आता है वो खुद उसके लिए बदलने लगती है.
शायद भगवान् ने नारी को बनाया हे ऐसा है वो हर महॊल मैं खुद को बदल कर हर किसी का ध्यान रख सके भगवान् की बहुत अनुपम सी रचना है वो

2 Comments:

Blogger Ashwini Kumar said...

इन दिनों आप फिर से अपने ब्लॉग पर सक्रिय हुई हैं ... अच्छा लगता है आपको पढ़कर . मानवीय रिश्तों के मर्म को बहुत खूबसूरती से उभारा है आपने .

21 May 2013 at 15:13  
Blogger Amita said...

हौंसला अफजाई के लिए धन्यवाद

8 August 2013 at 01:50  

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