Tuesday, 20 January 2009

दोस्ती...

मुहब्बतों में दिखावे की दोस्ती न मिला,
अगर गले नहीं मिलता तो हाथ भी न मिला।

घरों पे नाम थे, नामों के साथ ओहदे थे,
बहुत तलाश किया, कोई आदमी न मिला।

तमाम रिश्तों को मैं घर पे छोड़ आया था,
फिर उसके बाद मुझे कोई अजनबी न मिला।

ख़ुला की इतनी बड़ी क़ायनात में मैंने,
बस एक शख़्स को मांगा, मुझे वही न मिला।

बहुत अजीब है ये क़ुरबतों की दूरी भी,
वो मेरे साथ रहा और मुझे कभी न मिला।

(उर्दू अदब की अज़ीम शख़्सियत बशीर बद्र के अ`शआर)

6 comments:

  1. INSAAF KE DAAMAN PE LAHU KISKO DIKHAUN

    MUNSIF HAI GUNHEGAAR, MAIN KUCHH SOCH RAHA HOON

    AMITA,

    GHAZAL KA SAFAR ZINDA RAKHNE KE LIYE, BAHUT BAHUT BADHAI

    NISHANT

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  2. Amita ji,
    itnee sundar,bhavpoorna gazalen padhvane ke liye sadhuvad.kabhee mere blog par aiye.apka svagat hai.
    Poonam

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  3. "तमाम रिश्तों को मैं घर पे छोड़ आया था,
    फिर उसके बाद मुझे कोई अजनबी न मिला।"

    ये ख़ूबसूरत पंक्तियां हम तक पहुंचाने के लिए शुक्रिया...

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