मुहब्बतों में दिखावे की दोस्ती न मिला,
अगर गले नहीं मिलता तो हाथ भी न मिला।
घरों पे नाम थे, नामों के साथ ओहदे थे,
बहुत तलाश किया, कोई आदमी न मिला।
तमाम रिश्तों को मैं घर पे छोड़ आया था,
फिर उसके बाद मुझे कोई अजनबी न मिला।
ख़ुला की इतनी बड़ी क़ायनात में मैंने,
बस एक शख़्स को मांगा, मुझे वही न मिला।
बहुत अजीब है ये क़ुरबतों की दूरी भी,
वो मेरे साथ रहा और मुझे कभी न मिला।
(उर्दू अदब की अज़ीम शख़्सियत बशीर बद्र के अ`शआर)
